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Tuesday, October 9, 2018
अटल रहो-कमल कुलश्रेष्ठ
अटल रहो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
असत्य से तुम मत डरो, सत्य पर अटल रहो
छ्ल का सामना करो, ईमान पर अटल रहो
फरेब को उखाड दो , विश्वास पर अटल रहो
झूठ को तुम काट दो, साँच पर अटल रहो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
मुश्किले जब सामने हो, हौसला अटलरखो
घोर अधियारा हो जब, इच्छा शक्ति अटलरखो
डरो नही अत्याचार से, शक्ति को अटलरखो
हारो नही परिस्थिति से,हिम्मत अटलरखो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
ऊर्जा के तुम वाहक हो, स्फूर्ति को अटल रखो
तुम सर्वशक्ति दायक हो, मंशा को अटलरखो
पहाडो और नदियो में भी,
रास्ता तलाश लो,
काम को पूरा करो, जो काम हाथ में लो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
अटल रहोअटल रहोअटल रहोअटल रहो
কবিতা-মাম্পী ঘোষ
মরিচার কবরে
ওপারে দাঁড়িয়ে যে ছায়া অবয়ব
অবিকল আমারই মতো
তবে তফাতের আলোয়ান জড়ানো গায়।
তার চোখে আগুনের উত্তাপ
আমার আধপোড়া সিগারেটের মত নিভিয়ে আসা বিশ্বাস
বনসাই এর মত ছোট হয়ে আসা গণ্ডী।
তবে ও কে?
খরস্রোতার উপছে পড়া উদ্যাম
সৌরভ মাখা মখমলের বিছানো হাসি।
এসব কিছু আমি হারিয়েছি স্মৃতির অতল স্রোতে
আজ অর্ধ শতাব্দী পর কেউ কড়া নেড়ে গেল বুকে
আজ অর্ধ শতাব্দী পর জল ছুঁয়ে গেল পা
আজ অর্ধ শতাব্দী পর মৃত্যু বিষম ভয় পেল আমায়,
ছেড়ে দাঁড়াল পথ।
তবে কি ও মরিচার কবরে ঘুমানো আমি?
যে তরবারি হওয়ার স্বপ্ন বাঁচিয়ে রেখেছে আজও।
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